ठाकुर का कुआँ

ठाकुर का कुआँ

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जोखू बीमार है और प्यास से बेहाल है, लेकिन उसके लोटे के पानी से किसी मरे हुए जानवर की सड़ांध आ रही है। उसकी पत्नी गंगी उसे यह पानी पीने से रोक देती है। गाँव में साफ़ पानी के कुएँ मौजूद हैं, जो ठाकुर और साहू के हैं। लेकिन गंगी और जोखू दलित हैं। उन कुओं तक जाने का सीधा मतलब है ठाकुर की लाठियाँ और सवर्णों का क्रोध।

जोखू जानता है कि उनके जैसे लोगों के मरने पर गाँव में कोई दरवाज़े पर झाँकने तक नहीं आता। वह नाक बंद करके वही बदबूदार पानी पीने को तैयार हो जाता है, पर गंगी बर्तन हटा देती है। रात के नौ बजे, वह ठाकुर के कुएँ से पानी चुराने निकल पड़ती है—एक ऐसा कदम जिसकी सज़ा कुछ भी हो सकती है।

मुंशी प्रेमचंद की यह लघु कथा बीसवीं सदी के भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था और छुआछूत का एक सीधा विवरण है। यह ग्रामीण यथार्थ का वह रूप है जहाँ पानी जैसी बुनियादी ज़रूरत भी जाति के नियमों से तय होती है।

PublisherKafka
LanguageHindi
Source
munshi-premchand-all-stories