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रंगभूमि

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मुंशी प्रेमचंद

19h 35m
234,944 words
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बनारस के बाहरी छोर पर बसी मलिन बस्ती पाँड़ेपुर में, जहाँ न शहर के दीपकों की रोशनी पहुँचती है और न जल-स्रोतों का प्रवाह, सूरदास नाम का एक नेत्रहीन भिखारी रहता है। समाज ने उसे केवल सड़क किनारे लाठी टेककर इक्केवालों और राहगीरों से भीख माँगने का काम सौंपा है।

लेकिन इस कमज़ोर और हाशिए पर पड़े व्यक्ति के पास अपनी ज़मीन का एक टुकड़ा है। जब शहर के ताकतवर लोग और कारखानेदार अपने मुनाफे के लिए उस ज़मीन पर कब्ज़ा करने आते हैं, तो सूरदास अपनी जगह से हटने से इंकार कर देता है। वह अपनी ज़मीन और पशुओं के चरागाह को बचाने के लिए नए उद्योगों, धन-बल और पूरी व्यवस्था से सीधे टकराता है।

ब्रिटिश काल में लिखा गया मुंशी प्रेमचंद का यह उपन्यास 20वीं सदी के भारत में हो रहे औद्योगिक और सामाजिक बदलावों का दस्तावेज़ है। यह एक दलित भिखारी के ज़मीन के संघर्ष को सीधे राष्ट्रीय और आर्थिक असमानता के टकराव के रूप में दर्ज करता है।

उपन्याससामाजिक यथार्थवादहिंदी साहित्यआदर्शोन्मुख यथार्थवाद20वीं सदीब्रिटिश कालसामाजिक सुधारजातिवादधर्म और समाजगरीबीशोषणमानवीय संघर्षभारतीय समाजनैतिक मूल्यआर्थिक असमानता
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
Wikisource

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