अलंकार

अलंकार

मुंशी प्रेमचंद

5h 2m
60,344 words
hi

एक साधारण सरकारी कर्मचारी का जीवन तब उलझनों में फँस जाता है जब वह समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान की चाहत में अपनी सीमित आय से कहीं अधिक खर्च करने लगता है। प्रेमचंद हमें एक ऐसे मध्यवर्गीय परिवार के भीतर ले जाते हैं जहाँ बाहरी दिखावे और आंतरिक वास्तविकता के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जाती है। नायक अपने पद और पहचान के अनुरूप एक निश्चित जीवनशैली बनाए रखने के दबाव में है, लेकिन उसकी जेब इस भव्यता को सहन नहीं कर सकती।

यह कहानी उस सामाजिक दिखावे की विडंबना को उजागर करती है जो मध्यवर्गीय जीवन की रीढ़ बन गई है। प्रेमचंद की लेखनी में व्यंग्य की वह बारीक धार है जो पात्रों की कमजोरियों को उजागर करते हुए भी उनके प्रति करुणा बनाए रखती है। कहानी का स्वर यथार्थवादी है—न अत्यधिक नाटकीय, न भावुक—बल्कि उस रोजमर्रा की त्रासदी को दर्शाता है जो छोटी-छोटी महत्वाकांक्षाओं और असुरक्षाओं से जन्म लेती है।

यह रचना प्रेमचंद के उस साहित्यिक सरोकार का प्रतिनिधित्व करती है जो सामाजिक आडंबर और नैतिक मूल्यों के द्वंद्व को सामने लाता है। वे पाठक जो मानवीय कमजोरियों की सूक्ष्म पड़ताल में रुचि रखते हैं, और जो समझना चाहते हैं कि कैसे समाज का दबाव व्यक्ति को उसकी स्वाभाविक ईमानदारी से भटका देता है, उन्हें यह कहानी एक प्रासंगिक दर्पण के रूप में मिलेगी जो आज भी उतना ही प्रभावी है।

PublisherKafka
LanguageHindi
Source
EPUB — Public Domain