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मरहूम की याद में

मरहूम की याद में

पतरस बुख़ारी

27 min
5,237 words
hi
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बरामदे में कुर्सियाँ डाले दो दोस्त ख़ामोशी से बैठे हैं। सड़क पर कुछ वक़्फ़े के बाद एक मोटर कार गुज़रती है। उसकी उड़ती हुई धूल जब फेफड़ों और दिमाग़ तक पहुँचती है, तो एक आदमी अपनी एफ़.ए. की रसायन विज्ञान की किताब निकालकर बम बनाने का नुस्ख़ा खोजने लगता है। महज़ एक कार को गुज़रते देख उसे दुनिया की सारी दौलत बराबर बाँटने की सूझती है, और वह अपने बेपरवाह दोस्त मिर्ज़ा से इंसान और हैवान के बीच का फ़र्क़ पूछने लगता है।

इस संग्रह में मध्यवर्गीय जीवन की ऐसी ही घटनाएँ दर्ज हैं। सड़क पर पैदल चलने वाले की कुंठा, पुरानी दोस्ती की बेतुकी बहसें, और ज़माने की ना-साज़गारी पर उठने वाले सवाल इन पन्नों पर व्यंग्य का हिस्सा बनते हैं।

पतरस बुख़ारी द्वारा लिखे गए ये निबंध 20वीं सदी के उर्दू साहित्य और आधुनिक हास्य-व्यंग्य की बुनियादी रचनाओं में गिने जाते हैं।

हास्यव्यंग्यउर्दू साहित्यभारतीय साहित्यनिबंध20वीं सदीआधुनिक साहित्यसामाजिक व्यंग्यहास्य व्यंग्यगद्य साहित्य
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
ptrs-ke-mj-aamiin-ptrs-bukh-aarii

Books by पतरस बुख़ारी

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