
बरामदे में कुर्सियाँ डाले दो दोस्त ख़ामोशी से बैठे हैं। सड़क पर कुछ वक़्फ़े के बाद एक मोटर कार गुज़रती है। उसकी उड़ती हुई धूल जब फेफड़ों और दिमाग़ तक पहुँचती है, तो एक आदमी अपनी एफ़.ए. की रसायन विज्ञान की किताब निकालकर बम बनाने का नुस्ख़ा खोजने लगता है। महज़ एक कार को गुज़रते देख उसे दुनिया की सारी दौलत बराबर बाँटने की सूझती है, और वह अपने बेपरवाह दोस्त मिर्ज़ा से इंसान और हैवान के बीच का फ़र्क़ पूछने लगता है।
इस संग्रह में मध्यवर्गीय जीवन की ऐसी ही घटनाएँ दर्ज हैं। सड़क पर पैदल चलने वाले की कुंठा, पुरानी दोस्ती की बेतुकी बहसें, और ज़माने की ना-साज़गारी पर उठने वाले सवाल इन पन्नों पर व्यंग्य का हिस्सा बनते हैं।
पतरस बुख़ारी द्वारा लिखे गए ये निबंध 20वीं सदी के उर्दू साहित्य और आधुनिक हास्य-व्यंग्य की बुनियादी रचनाओं में गिने जाते हैं।