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शतरंज के खिलाड़ी

शतरंज के खिलाड़ी

मुंशी प्रेमचंद

18 min
3,595 words
hi
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नवाब वाजिद अली शाह का लखनऊ विलासिता और अफीम की खुमारी में डूबा हुआ है। जब शहर तीतरों की लड़ाई और महफिलों में मग्न है, तब दो रईस—मिरज़ा सज्जादअली और मीर रौशनअली—अपनी मौरूसी जागीरों के सहारे रोज़ सुबह नाश्ते के बाद बिसात बिछाकर बैठ जाते हैं। उनका पूरा दिन मोहरों की चालें चलने और शह-मात के दांव-पेंच में बीतता है।

बाहर, ईस्ट इंडिया कंपनी की फौजें अवध की सत्ता छीनने के लिए आगे बढ़ रही हैं। लेकिन इन दोनों मित्रों को बाहरी दुनिया या अपने राज्य के पतन की कोई फिक्र नहीं है। उनकी एकमात्र चिंता अपने शतरंज के बादशाह को सुरक्षित रखने की है।

प्रेमचंद की यह कहानी ब्रिटिश राज की शुरुआत में एक पतनशील सामंती समाज को दर्ज करती है। यह अवध के अधिग्रहण और तत्कालीन भारतीय अभिजात वर्ग की निष्क्रियता पर लिखा गया एक राजनीतिक व्यंग्य है।

कथा साहित्यलघु कथायथार्थवादउपनिवेशवादब्रिटिश राज19वीं सदीअवधलखनऊसामाजिक यथार्थवादराजनीतिक व्यंग्यसामंती समाजपतनशील अभिजात वर्गशतरंजवाजिद अली शाहहिंदी साहित्य
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
munshi-premchand-all-stories

Books by मुंशी प्रेमचंद

हार की जीतहार की जीत
ईदगाहईदगाह
कलम, तलवार और त्यागकलम, तलवार और त्याग
कर्बलाकर्बला
गबनगबन
गोदानगोदान
अलंकारअलंकार
मंत्रमंत्र
विचार: प्रेमचंदविचार: प्रेमचंद
प्रेमचंद कहानी समग्रप्रेमचंद कहानी समग्र
नमक का दरोग़ानमक का दरोग़ा
माँमाँ
पंच परमेश्वरपंच परमेश्वर
पाँच फूलपाँच फूल
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प्रवासीलाल वर्मा के नाम पत्रप्रवासीलाल वर्मा के नाम पत्र
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सेवासदनसेवासदन
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