
नवाब वाजिद अली शाह का लखनऊ विलासिता और अफीम की खुमारी में डूबा हुआ है। जब शहर तीतरों की लड़ाई और महफिलों में मग्न है, तब दो रईस—मिरज़ा सज्जादअली और मीर रौशनअली—अपनी मौरूसी जागीरों के सहारे रोज़ सुबह नाश्ते के बाद बिसात बिछाकर बैठ जाते हैं। उनका पूरा दिन मोहरों की चालें चलने और शह-मात के दांव-पेंच में बीतता है।
बाहर, ईस्ट इंडिया कंपनी की फौजें अवध की सत्ता छीनने के लिए आगे बढ़ रही हैं। लेकिन इन दोनों मित्रों को बाहरी दुनिया या अपने राज्य के पतन की कोई फिक्र नहीं है। उनकी एकमात्र चिंता अपने शतरंज के बादशाह को सुरक्षित रखने की है।
प्रेमचंद की यह कहानी ब्रिटिश राज की शुरुआत में एक पतनशील सामंती समाज को दर्ज करती है। यह अवध के अधिग्रहण और तत्कालीन भारतीय अभिजात वर्ग की निष्क्रियता पर लिखा गया एक राजनीतिक व्यंग्य है।