
Translated by मुंशी प्रेमचंद
1910 में लंदन में पहली बार खेला गया गाल्सवर्दी का यह नाटक एक छोटे लॉ-क्लर्क फ़ाल्डर की कहानी है, जो एक विवाहित स्त्री से प्रेम करता है और उसे अपने पति की हिंसा से बचाने के लिए दफ़्तर के एक चेक में जालसाज़ी कर देता है। पकड़ा जाता है। अदालत उसे तीन वर्ष की सश्रम क़ैद और एकांत-कारावास की सज़ा सुनाती है।
नाटक का तीसरा अंक — जिसमें फ़ाल्डर एकांत कोठरी में अकेला, मूक, धीरे-धीरे टूटता दिखाई देता है — विश्व रंगमंच के सबसे शक्तिशाली दृश्यों में से एक है। यह दृश्य बिना किसी संवाद के लगभग पाँच मिनट तक चलता है। इसे देखकर तत्कालीन गृह सचिव विंस्टन चर्चिल इतना द्रवित हुए कि उन्होंने ब्रिटिश जेलों में एकांत-कारावास की अवधि को घटाने का क़ानून पारित कराया — साहित्य द्वारा सीधे क़ानून बदलने का यह एक दुर्लभ उदाहरण है।
नाटक का अंत कठोर है। फ़ाल्डर जेल से लौटकर जीवन में जगह नहीं बना पाता, हर तरफ़ से ठुकराया जाता है, और अंततः अपनी जान दे देता है। 'न्याय' का अंतिम संदेश यही है — क़ानून ने अपना काम कर दिया, परन्तु क्या न्याय हुआ?
प्रेमचंद का अनुवाद मंच के लिए ही नहीं, पाठ्य पठन के लिए भी सहज है। संवादों की लय और स्थितियों का तनाव दोनों मूल के क़रीब हैं।
यह नाटक उन पाठकों के लिए है जो दंड-व्यवस्था पर सोचना चाहते हैं — और जो साहित्य को केवल मनोरंजन नहीं, सामाजिक परिवर्तन का उपकरण मानते हैं।