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काबुलीवाला

काबुलीवाला

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

17 min
3,301 words
hi
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यह एक छोटी लड़की की निर्दोष बातचीत और एक विदेशी फेरीवाले के बीच की अनोखी दोस्ती की कहानी है। काबुल से आया रहमत, सूखे मेवे बेचने वाला, कलकत्ता की गलियों में अपनी आजीविका कमाता है, लेकिन उसके दिल में अपनी छोटी बेटी की याद बसी रहती है। पाँच वर्षीय मिनी, जो हर किसी से बातें करने को उत्सुक रहती है, काबुलीवाले को अपना दोस्त मान लेती है। यह रिश्ता समाज की सीमाओं को लाँघता है—एक ओर अमीर बंगाली परिवार, दूसरी ओर अफ़गान मज़दूर।

कहानी पितृत्व की सार्वभौमिक भावना को छूती है। जब रहमत को एक झगड़े में किसी को घायल करने के आरोप में जेल हो जाती है, वर्षों बीत जाते हैं। वह मिनी के विवाह के दिन लौटता है, केवल यह जानने के लिए कि वह छोटी सी बच्ची अब एक युवती बन चुकी है, जो उसे पहचानती तक नहीं। लेखक ने यहाँ समय की क्रूरता और बचपन की क्षणभंगुरता को बेहद संवेदनशीलता से चित्रित किया है। मिनी के पिता को तब अहसास होता है कि काबुलीवाले का भी एक घर है, एक बेटी है जो शायद उसे भूल चुकी होगी।

यह रचना इसलिए कालजयी है क्योंकि यह मानवीय संबंधों की गहराई को बिना किसी भावुकता के प्रस्तुत करती है। ठाकुर ने सामाजिक वर्ग, राष्ट्रीयता और धर्म की दीवारों के पार झाँककर दिखाया है कि प्रेम और याद की भाषा एक ही होती है। जो पाठक सूक्ष्म भावनाओं की बारीकियों को समझते हैं, जो पिता-पुत्री के रिश्ते की पवित्रता को महसूस कर सकते हैं, और जो प्रवासी जीवन की पीड़ा से परिचित हैं, उनके लिए यह कहानी एक दर्पण की तरह है।

कथा संग्रहबंगाली साहित्यभारतीय साहित्यउन्नीसवीं सदीबंगाल पुनर्जागरणमानवीय संवेदनास्त्री विमर्शदार्शनिक कहानियाँरोमांटिक साहित्यसामाजिक सुधारनोबेल पुरस्कार विजेताक्लासिक साहित्यहिंदी अनुवादTagoreटैगोर
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
tagore-hindi-stories

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