पंच परमेश्वर

पंच परमेश्वर

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जुम्मन शेख और अलगू चौधरी की मित्रता गाँव में एक मिसाल है। साझे की खेती, साझे का लेन-देन और एक-दूसरे के घर की रखवाली। धर्म अलग हैं, पर विचार एक। यह साझा तब से है जब वे दोनों बालक थे और जुम्मन के पिता जुमराती शेख से शिक्षा लेते थे। लेकिन यह पुराना रिश्ता उस दिन एक अजनबी मोड़ लेता है, जब गाँव की पंचायत बैठती है और अलगू चौधरी को पंच की कुर्सी पर बैठकर अपने ही दोस्त जुम्मन के खिलाफ फैसला सुनाना पड़ता है।

पंच के आसन पर बैठा व्यक्ति न किसी का मित्र होता है, न शत्रु। यहाँ दोस्ती और व्यक्तिगत वफादारी का सामना न्याय के उस तराजू से होता है, जहाँ पंच की आवाज़ को परमेश्वर की आवाज़ माना जाता है।

बीसवीं सदी की शुरुआत में प्रकाशित यह मुंशी प्रेमचंद की आरंभिक कहानियों में से एक है। यह भारतीय ग्रामीण जीवन, उस समय की पंचायत व्यवस्था और न्याय की धारणा का एक सीधा दस्तावेज़ है, जिसने हिंदी गद्य में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की नींव रखी।

PublisherKafka
LanguageHindi
Source
munshi-premchand-all-stories