
प्रवासीलाल वर्मा के नाम पत्र
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11,130 words
hi
ये पत्र प्रेमचंद के अंतिम वर्षों के कारोबारी और रचनात्मक संघर्ष का सजीव दस्तावेज़ हैं। लखनऊ की ‘माधुरी’ से लेकर बंबई की अजंता सिनेटोन और बनारस के ‘हंस’ कार्यालय तक — प्रेमचंद अपने प्रकाशन-सहयोगी प्रवासीलाल वर्मा से प्रेस की पूँजी, छपाई, बिक्री, हड़ताल, रॉयल्टी और साझे के हिसाब पर सीधी, बेलाग बातें करते हैं। पहले पत्रों की उत्साहपूर्ण साझेदारी अंतिम पत्रों तक आते-आते कड़वी असहमतियों में बदल जाती है। यह संग्रह प्रेमचंद के व्यक्तित्व का वह पक्ष उद्घाटित करता है जो उनकी कहानियों में नहीं दिखता — एक प्रकाशक, संपादक और मित्र की व्यावहारिक चिंताएँ। मूल पाठ हिन्दवी (रेख़्ता फ़ाउंडेशन) से लिया गया है।
हिन्दी साहित्यपत्रपत्राचारप्रेमचंदस्वतंत्रता-पूर्व साहित्यगद्यसाहित्यिक पत्रहिंदी प्रकाशनहंस पत्रिकाबीसवीं सदीक्लासिक साहित्य
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