
माँ
"माँ" मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक मार्मिक कहानी है जो भारतीय समाज में माँ के त्याग, प्रेम और समर्पण को उजागर करती है। यह कहानी एक गरीब विधवा माँ के संघर्ष और उसके पुत्र के प्रति असीम स्नेह को केंद्र में रखकर लिखी गई है। कहानी में माँ अपने बेटे की शिक्षा और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए हर संभव कष्ट सहती है, भूखी रहती है और अपनी सभी आवश्यकताओं को त्याग देती है। जब बेटा बड़ा होकर शहर जाता है और शिक्षित होकर नौकरी पा लेता है, तब वह अपनी माँ की उपेक्षा करने लगता है और उसके त्याग को भूल जाता है। यह कथा तब चरम पर पहुँचती है जब माँ अपने बेटे से मिलने शहर जाती है और उसे अपमान और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।
प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से भारतीय समाज में माँ-बेटे के रिश्तों की जटिलता, आधुनिकता के प्रभाव से पैदा हुई संवेदनहीनता, और पारिवारिक मूल्यों के क्षरण को बड़ी कुशलता से प्रस्तुत किया है। कहानी में वर्ग-भेद, शहरी-ग्रामीण विभाजन, और शिक्षित वर्ग में बढ़ते अहंकार जैसे विषयों को भी छुआ गया है। प्रेमचंद की यह रचना साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सामाजिक यथार्थवाद का उत्कृष्ट उदाहरण है और पाठकों को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है। यह कहानी आज भी प्रासंगिक है क्योंकि यह हमें याद दिलाती है कि भौतिक उन्नति के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक मूल्यों को बनाए रखना कितना आवश्यक है।

































