
स्वदेश
Translated by महावीर प्रसाद गहमरी
बीसवीं सदी की शुरुआत में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने आसपास एक टूटती और बनती दुनिया देखी। एक ओर पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध थी, दूसरी ओर अपनी पुरानी संस्कृति की गहराई। बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन के बीच लिखे गए ये आठ निबंध उसी द्वंद्व का दस्तावेज़ हैं — जहाँ टैगोर भारतीय इतिहास, धर्म, जातिप्रथा और राष्ट्रीय पहचान पर अपने विचारों को निर्भीकता से रखते हैं।
इस संग्रह में टैगोर पूर्वी और पश्चिमी सभ्यताओं के बीच के अंतर को न केवल समझाते हैं बल्कि उनके मूल आधारों की भी पड़ताल करते हैं। 'नया और पुराना' में वे आधुनिकता और परंपरा के संघर्ष को सुलझाने का प्रयास करते हैं। 'ब्राह्मण' और 'समाज-भेद' में जातिव्यवस्था पर सूक्ष्म किन्तु तीखी दृष्टि है। 'देसी रजवाड़े' में औपनिवेशिक भारत की राजनीतिक संरचना का विश्लेषण है। हर निबंध एक प्रश्न उठाता है, और उत्तर देने के बजाय पाठक को सोचने पर मजबूर करता है।
महावीर प्रसाद गहमरी का यह अनुवाद टैगोर के नोबेल पुरस्कार के कुछ ही वर्षों बाद प्रकाशित हुआ — हिन्दी पाठकों के लिए यह उन दुर्लभ अवसरों में से एक है जब बंगाली के मूल बौद्धिक तेज को उसके समकालीन अनुवाद में पढ़ा जा सकता है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो टैगोर को केवल कवि या उपन्यासकार के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरे विचारक के रूप में भी जानना चाहते हैं — और जो भारतीय आधुनिकता के मूल प्रश्नों से जूझने को तैयार हैं।












