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नमक का दरोग़ा

नमक का दरोग़ा

मुंशी प्रेमचंद

15 min
2,876 words
hi
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उपनिवेशकालीन भारत में मुंशी वंशीधर रोज़गार की तलाश में निकलते हैं। विदाई के समय उनके पिता उन्हें समझाते हैं कि मासिक वेतन पूर्णमासी के चाँद की तरह है जो जल्द लुप्त हो जाता है; इसलिए निगाह उस काम पर रखनी चाहिए जहाँ ऊपरी आय का बहता हुआ स्रोत हो। वंशीधर को नवगठित नमक विभाग में दारोगा का पद मिलता है, लेकिन वे पिता की नसीहत के उलट काम करते हैं।

जब वंशीधर रात के अँधेरे में नमक की अवैध गाड़ियों को रोकते हैं, तो इलाके के एक रसूखदार ज़मींदार उन्हें भारी रिश्वत की पेशकश करते हैं। वंशीधर इस सौदे को ठुकरा कर उन्हें गिरफ़्तार कर लेते हैं। नतीजतन, अदालत में धन के आगे क़ानून झुक जाता है और वंशीधर को अपनी नौकरी गँवानी पड़ती है—पर यह उनके इस टकराव का अंतिम दृश्य नहीं है।

मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी बीसवीं सदी की शुरुआत के भारतीय समाज को दर्ज करती है। यह औपनिवेशिक नौकरशाही में फैले भ्रष्टाचार और एक व्यक्ति के नैतिक आदर्शों के बीच के सीधे संघर्ष का विवरण है।

कहानी संग्रहहिंदी साहित्ययथार्थवादभ्रष्टाचारनैतिकताईमानदारीसामाजिक यथार्थउपनिवेशकाल19वीं-20वीं शताब्दीप्रेमचंदसामाजिक सुधारनौकरशाहीनैतिक द्वंद्वआदर्शवादहिंदी गद्य
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
munshi-premchand-all-stories

Books by मुंशी प्रेमचंद

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कलम, तलवार और त्यागकलम, तलवार और त्याग
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