
Translated by मुंशी प्रेमचंद
1906 में लंदन के रॉयल कोर्ट थिएटर पर पहली बार खेला गया यह नाटक गाल्सवर्दी का रंगमंच में पदार्पण था — और तुरंत ही एक संवेदनशील कलाकार के रूप में उनकी पहचान बन गया। नाटक की कथा बेहद सरल है, परन्तु उसकी टक्कर बेहद तीखी।
एक नशे में धुत अमीर युवक जैक बार्थविक एक भिखारिन की वैनिटी बैग चुरा लाता है। उसी रात एक गरीब बेरोज़गार जोन्स — जिसकी पत्नी बार्थविक के घर में नौकरानी है — मालिक के घर में एक चाँदी की डिबिया चुरा ले जाता है। दोनों चोरियाँ एक रात में हुई हैं। पर अदालत में केवल जोन्स का मुक़दमा चलता है। बार्थविक के पिता रसूख वाले हैं, और चोरी की बात पारिवारिक मामला बनकर रह जाती है।
गाल्सवर्दी ने इस नाटक से अंग्रेज़ी रंगमंच को एक नई दृष्टि दी — कि क़ानून अपने आप में सत्य का प्रतीक नहीं, बल्कि एक सामाजिक यंत्र है जो वर्ग के अनुसार न्याय बाँटता है। नाटक का अंतिम दृश्य — मिसेज़ जोन्स अदालत से बार्थविक को भागते देखती हैं — बिना किसी अतिनाटकीय टिप्पणी के अपनी बात कह जाता है।
प्रेमचंद ने इस अनुवाद को 1930 के दशक में तैयार किया, जब भारत में औपनिवेशिक न्याय-व्यवस्था की असमानता सामने थी। अनुवाद की भाषा सहज, मंचनीय, और मूल की कटुता को बनाए रखनेवाली है।
यह नाटक उन पाठकों के लिए है जो आधुनिक यूरोपीय नाटक की शुरुआत और सामाजिक यथार्थवाद की परंपरा को समझना चाहते हैं।