
पतरस बुख़ारी द्वारा रचित "मैं एक मियाँ हूँ" उर्दू-हिंदी साहित्य में हास्य-व्यंग्य की एक अनमोल कृति है। यह रचना एक व्यक्ति की आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई है जो अपने आप को 'मियाँ' कहता है और अपनी दैनिक जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं, विचित्र अनुभवों और मानवीय कमजोरियों को बेहद सहज और मनोरंजक तरीके से प्रस्तुत करता है। बुख़ारी की लेखनी की विशेषता यह है कि वे सामान्य जीवन की घटनाओं में भी असाधारण हास्य और गहन अर्थ खोज लेते हैं।
इस रचना की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता और सहजता है। पतरस बुख़ारी मध्यवर्गीय समाज की विसंगतियों, मानवीय दुर्बलताओं और सामाजिक रीति-रिवाजों पर इस तरह व्यंग्य करते हैं कि पाठक हँसते-हँसते अपने समाज का दर्पण देख लेता है। उनका हास्य कभी कटु या आक्रामक नहीं होता बल्कि एक मित्रवत और आत्मविडंबनापूर्ण शैली में होता है जो पाठक को सोचने पर मजबूर करता है।
ऐतिहासिक दृष्टि से यह रचना बीसवीं सदी के प्रारंभिक और मध्य काल के भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज है। पतरस बुख़ारी को उर्दू साहित्य में हास्य-व्यंग्य का पितामह माना जाता है और उनकी यह कृति आधुनिक उर्दू गद्य के विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। उनकी लेखन शैली ने अनेक बाद के लेखकों को प्रभावित किया और हास्य साहित्य को एक गंभीर साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करने में योगदान दिया। यह पुस्तक आज भी उतनी ही प्रासंगिक है क्योंकि इसमें वर्णित मानवीय स्वभाव और सामाजिक परिस्थितियाँ कालजयी हैं।