
जातिभेद का उच्छेद
Translated by संतराम
जातिभेद का उच्छेद (Annihilation of Caste) डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा 1936 में लिखा गया एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी भाषण है जो उन्हें जात-पाँत तोड़क मंडल, लाहौर के वार्षिक सम्मेलन में देना था। हालाँकि यह भाषण कभी मौखिक रूप से प्रस्तुत नहीं हुआ क्योंकि आयोजकों ने इसकी कट्टरपंथी सामग्री के कारण निमंत्रण वापस ले लिया, लेकिन अम्बेडकर ने इसे स्वयं प्रकाशित किया और यह भारतीय सामाजिक सुधार साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गया। इस कृति में अम्बेडकर ने भारतीय समाज में जाति व्यवस्था की जड़ों, इसके धार्मिक औचित्य और इसके विनाशकारी प्रभावों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
इस पुस्तक में अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था को केवल एक सामाजिक बुराई नहीं बल्कि भारतीय समाज के विकास में सबसे बड़ी बाधा के रूप में चिन्हित किया है। उन्होंने हिंदू धर्म के शास्त्रों और परंपराओं की तीखी आलोचना की जो जाति व्यवस्था को धार्मिक स्वीकृति प्रदान करते हैं। अम्बेडकर का तर्क है कि जाति व्यवस्था का विनाश तभी संभव है जब हिंदू धर्म की धार्मिक और दार्शनिक नींव में मूलभूत परिवर्तन हो। उन्होंने सामाजिक सुधार के सतही प्रयासों की आलोचना करते हुए कहा कि केवल अंतरजातीय विवाह या सहभोज जैसे उपायों से जाति व्यवस्था समाप्त नहीं हो सकती।
यह पुस्तक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक न्याय के इतिहास में मील का पत्थर है क्योंकि इसने पहली बार जाति व्यवस्था के खिलाफ एक व्यापक और तर्कसंगत बहस प्रस्तुत की। अम्बेडकर की यह रचना महात्मा गांधी के साथ उनके वैचारिक मतभेदों को भी उजागर करती है, विशेषकर जाति और वर्ण व्यवस्था के मुद्दे पर। आज भी यह पुस्तक दलित अधिकार आंदोलन, सामाजिक समानता और मानवाधिकारों के संघर्ष में प्रेरणा का स्रोत है।























