बूढ़ी काकी

बूढ़ी काकी

मुंशी प्रेमचंद

17 min
3,211 words
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"बूढ़ी काकी" मुंशी प्रेमचंद की एक मार्मिक कहानी है जो वृद्धावस्था में पारिवारिक उपेक्षा और सामाजिक तिरस्कार की त्रासदी को चित्रित करती है। कहानी की मुख्य पात्र बूढ़ी काकी हैं, जो अपने भतीजे बुद्धिराम के घर में रहती हैं। एक समय संपन्न परिवार की मुखिया रह चुकी काकी अब अपने ही घर में अवांछित बोझ समझी जाती हैं। भोजन के समय उन्हें दूसरों के खाने के बाद बचे-खुचे टुकड़े मिलते हैं, और घर के सदस्यों द्वारा उनकी लगातार उपेक्षा की जाती है। कहानी का मोड़ तब आता है जब घर में एक छोटा बच्चा लाडला अपनी दादी काकी के प्रति सहानुभूति दिखाता है और उन्हें अपना भोजन देने का प्रयास करता है।

इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद जी ने भारतीय संयुक्त परिवार व्यवस्था की कड़वी सच्चाई को उजागर किया है, जहाँ बुजुर्गों के प्रति सम्मान और देखभाल केवल दिखावे तक सीमित रह जाती है। कहानी में निहित मानवीयता, करुणा, और पारस्परिक स्नेह के थीम आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। प्रेमचंद ने सामाजिक पाखंड और स्वार्थपरता के विरुद्ध एक मूक आवाज उठाई है, जो पाठकों के मन में गहरी छाप छोड़ती है। यह कृति हिंदी साहित्य में यथार्थवादी कहानियों की परंपरा में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है और आधुनिक भारत में बदलती पारिवारिक संरचना के संदर्भ में आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

PublisherKafka
LanguageHindi
Source