
औपनिवेशिक उत्तर प्रदेश के एक गाँव में, कर्ज में डूबा किसान होरी राम ज़मींदार की खुशामद को अपनी नियति मानता है। उसका तर्क है कि जब गर्दन दूसरे के पाँवों तले दबी हो, तो उन पाँवों को सहलाने में ही कुशलता है। लेकिन उसकी पत्नी धनिया इस बेबसी को नकारती है। बीस साल के वैवाहिक जीवन, लगान चुकाने की कभी न खत्म होने वाली जद्दोजहद और तीन बच्चों को गरीबी में खोने के बाद, इस परिवार की सबसे बड़ी लालसा अपने दरवाजे पर एक गाय बाँधने की है।
एक गाय उनके बेटे गोबर के लिए दूध और समाज में सम्मान का सीधा प्रतीक है। लेकिन सामंतवाद और सूदखोरी पर टिके इस ढाँचे में, यह एक इच्छा उन्हें ऋण के ऐसे दुष्चक्र में धकेल देती है जहाँ से बाहर आने का कोई रास्ता नहीं बचता। होरी की पाई-पाई बचाने की कोशिशें और धनिया का ज़मींदार के खिलाफ आक्रोश, बेदखली और जातिवाद के कड़े नियमों से लगातार टकराते हैं।
१९३६ में प्रकाशित मुंशी प्रेमचंद का यह अंतिम पूर्ण उपन्यास है। यह औपनिवेशिक भारत में किसान संघर्ष, ऋणग्रस्तता और ग्रामीण व्यवस्था का एक सीधा ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।