
दारोगा कृष्णचन्द्र ने पच्चीस साल की नौकरी में अपनी नीयत कभी बिगड़ने नहीं दी, पर अब वह अपनी ही भलाई पर पछता रहे हैं। उनकी बेटी, सुमन, का विवाह तो हो जाता है, लेकिन दहेज और सम्मान के सवालों पर उसे ससुराल से निकाल दिया जाता है। अपने पिता के घर में भी उसे पनाह नहीं मिलती। शहर की गलियों में, समाज के दोहरे मापदंडों के बीच, सुमन को एक ऐसा रास्ता चुनना पड़ता है जो सम्मानित घरों की स्त्रियों के लिए बंद है।
सुमन का नया घर शहर के शरीफ़ों के मोहल्ले के ठीक सामने है, और उसकी मौजूदगी उन लोगों के लिए एक आईना बन जाती है जो दिन में नैतिकता की बात करते हैं। उसका जीवन उन वकीलों, कवियों और समाज सुधारकों के लिए बहस का मुद्दा बन जाता है जो नारी-उद्धार के नारे तो लगाते हैं, पर अपने घरों की स्त्रियों को पर्दे में रखते हैं।
मुंशी प्रेमचंद का यह पहला प्रमुख हिंदी उपन्यास है, जिसने कथा-साहित्य को तिलिस्मी कहानियों से निकालकर बीसवीं सदी के भारतीय समाज के यथार्थ से जोड़ा। इसने स्त्री के सार्वजनिक जीवन में स्थान को लेकर एक बहस को जन्म दिया, जो उस दौर के सामाजिक सुधार आंदोलनों का केंद्र थी।