
कृष्ण और उनकी गीता
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hi
भीमराव अंबेडकर का यह दीर्घ निबंध भगवद्गीता की पारम्परिक प्रतिष्ठा को चुनौती देता है। अंबेडकर की स्थापना है कि गीता न तो मूल दर्शन-ग्रंथ है, न ही धर्मग्रंथ — बल्कि यह बौद्ध धर्म के उदय के बाद ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति का दार्शनिक समर्थन है। वे तर्क देते हैं कि गीता तीन बातों को न्यायोचित ठहराती है: युद्ध और हिंसा, चातुर्वर्ण्य व्यवस्था, और कर्मकांड। जैमिनी की पूर्व-मीमांसा, मनुस्मृति और बौद्ध दर्शन का विस्तृत विश्लेषण करते हुए अंबेडकर गीता के रचना-काल को भी बौद्ध धर्म के बाद का सिद्ध करते हैं। यह लेख अंबेडकर के अधूरे पांडुलिपियों से प्रकाशित है।
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LanguageHindi
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