
'कंकाल' जयशंकर प्रसाद के गद्य साहित्य का एक ऐसा स्तंभ है, जो उनके अन्य उपन्यासों ('तितली' और 'इरावती') से बिल्कुल भिन्न धरातल पर खड़ा है। जहाँ प्रसाद जी अपनी अन्य रचनाओं में सांस्कृतिक गौरव और कोमल भावनाओं के लिए जाने जाते हैं, वहीं 'कंकाल' में वे एक समाज-शास्त्री की भाँति धर्मस्थलों, मठों और समाज के तथाकथित रक्षकों के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार और अनैतिकता की परतों को उधेड़ते हैं। उपन्यास की कथावस्तु काशी, प्रयाग और मथुरा जैसे धार्मिक केंद्रों के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ लेखक यह दिखाते हैं कि किस प्रकार धर्म की आड़ में मानवीय संवेदनाओं का शोषण किया जाता है।
उपन्यास के पात्र—जैसे विजय, तारा और किशोरी—सामाजिक रूढ़ियों और व्यक्तिगत कुंठाओं के बीच संघर्षरत हैं। प्रसाद जी ने इस कृति में अवैध संबंधों, अनाथालयों की स्थिति और विधवाओं के शोषण जैसे गंभीर मुद्दों को उठाया है। 'कंकाल' का अर्थ समाज के उस अस्थि-पंजर से है, जो मांस-मज्जा के आकर्षक आवरण के नीचे छिपा हुआ है। यह उपन्यास केवल एक कहानी नहीं, बल्कि समाज के नैतिक पतन की एक गहरी शल्य-चिकित्सा है। इसकी भाषा गंभीर और शैली विवरणात्मक है, जो पाठक को भारतीय समाज की उन कड़वी सच्चाइयों से रूबरू कराती है जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।