
आधी रात को एक पच्चीस वर्षीय युवक पाँच साल बाद अपने पुराने शहर लौटता है। उसके पास कोई सामान नहीं है; लंबे बालों में केवल कोयले की धूल है। प्लेटफार्म पर कदम रखते ही चाय, इंजन के धुएँ और लालटेन के काले लोहे की परिचित गंध उसे घेर लेती है। बाहर ताँगे अपनी चिर-परिचित सुस्ती के साथ चल रहे हैं। नगर में कुछ नहीं बदला है।
लेकिन बीस साल इसी मुहल्ले में बिताने वाला यह युवक अब पहले जैसा नहीं रह गया है। वह अपने ही अतीत और इस ठहरे हुए परिवेश को एक नए चश्मे से देखता है। बाहर के जमे हुए यथार्थ और उसके भीतर चल रहे मानसिक उथल-पुथल के बीच एक ऐसा टकराव शुरू होता है, जहाँ उसकी आत्मा अपने ही पुराने चेहरों के सामने अजनबी की तरह खड़ी हो जाती है।
गजानन माधव मुक्तिबोध का यह गद्य बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य की 'नई कहानी' और प्रगतिशील धारा का प्रमुख हिस्सा है। यह रचना तत्कालीन मध्यमवर्गीय जीवन की जड़ता और व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक एवं अस्तित्ववादी संघर्ष को स्पष्ट यथार्थ में दर्ज करती है।