
एक धनी किसान के तीन बेटे हैं। विजय सेना में ऊंचे पद और ज़मीन पर कब्ज़ा जमाता है, और तारा शहर में व्यापार की कोठी खोलता है। तीसरा बेटा, सुमंत, अपनी गूंगी-बहरी बहन मनोरमा के साथ खेत जोतने के लिए गांव में ही रह जाता है। जब विजय अपने इलाके के खर्चों को पूरा करने के लिए लौटकर परिवार की संपत्ति का तीसरा हिस्सा मांगता है, तो सुमंत बिना किसी बहस या लालच के खुशी-खुशी अपना हक उसे सौंप देता है।
समाज की नज़र में विजय और तारा चतुर हैं, जबकि सुमंत महज़ एक मूर्ख है जिसे धन या अधिकारों से कोई लेना-देना नहीं। लेकिन जब इन भाइयों का सर्वनाश करने के लिए शैतान उनके जीवन में प्रवेश करता है, तो विजय का बल और तारा का संचित धन धरे रह जाते हैं। शैतान के प्रहार के सामने केवल सुमंत का सीधापन और उसका शारीरिक श्रम ही टिक पाता है।
19वीं सदी के रूसी समाज की पृष्ठभूमि पर आधारित यह कहानी लियो टॉल्स्टॉय के उस दौर की रचना है, जब उन्होंने सत्ता और संपत्ति को नकारते हुए साधारण किसान जीवन और श्रम में नैतिकता का वास्तविक आधार देखना शुरू किया था।