प्रेमचंद
‘ठाकुर का कुआँ’ महज़ कुछ पन्नों में जाति और छुआछूत की क्रूरता को उजागर कर देती है। पानी जैसी बुनियादी ज़रूरत भी जहाँ जन्म से तय होती हो, वहाँ गंगी का छोटा-सा साहस और उसकी हार पाठक को भीतर तक हिला देती है। अदबी दुनिया की आवाज़ में।
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ठाकुर का कुआँ