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रस मीमांसा

रस मीमांसा

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

1h 2m
12,217 words
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मनुष्य का हृदय सामान्यतः स्वार्थ, लाभ-हानि और सुख-दुःख के संकुचित घेरे में बंधा रहता है। जब यह हृदय अपनी पृथक् सत्ता को भूलकर विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तो इस मुक्तावस्था को 'रस' कहते हैं। इसी मुक्ति की साधना के लिए रचे गए शब्दविधान यानी कविता को यहाँ कर्मयोग और ज्ञानयोग के समकक्ष रखा गया है, जिसे 'भावयोग' का नाम दिया गया है।

इसके अध्याय काव्य और मानव व्यवहार के संबंधों को सूत्रबद्ध करते हैं। इनमें मनुष्यता की उच्च भूमि, भावना व कल्पना की कार्यप्रणाली, और सौंदर्य के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट किया गया है। साथ ही, यह ग्रंथ महज़ मनोरंजन और चमत्कारवाद पर टिकी रचनाओं को अलग करते हुए, काव्य की भाषा और अलंकारों की सटीक सीमाएँ तय करता है।

बीसवीं सदी की हिंदी आलोचना का यह वह आधारभूत ग्रंथ है, जिसने भारतीय काव्यशास्त्र और रस सिद्धांत को आधुनिक वैचारिक ढाँचे में पारिभाषित कर 'शुक्ल युग' की नींव रखी।

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PublisherKafka
LanguageHindi
CopyrightThe source text and calculation are believed to be in the public domain.

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