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स्कंदगुप्त

स्कंदगुप्त

जयशंकर प्रसाद

2h 14m
26,701 words
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पांचवीं शताब्दी। उज्जयिनी के सैनिक शिविर में खड़ा युवराज स्कंदगुप्त सत्ता के सुख को सारहीन मानता है। वह स्वयं को गुप्त साम्राज्य का केवल एक सैनिक समझता है, अपने अधिकारों के प्रति पूर्णतः उदासीन। लेकिन साम्राज्य की नींव दरक रही है। वृद्ध सेनापति पर्णदत्त उसे सूचना देता है कि महाबलाधिकृत वीरसेन की मृत्यु हो चुकी है और कुसुमपुर में प्रौढ़ सम्राट विलासिता में डूब गए हैं। अयोध्या में नित्य नए राजनीतिक षड्यंत्र रचे जा रहे हैं, और सीमाओं पर हूणों के आक्रमण का संकट गहरा रहा है।

पांच अंकों का यह नाटक दो मोर्चों पर लड़े जाने वाले युद्ध का विवरण है। एक ओर विदेशी हूणों की सेना है, और दूसरी ओर राजमहल के भीतर का विश्वासघात तथा सत्ता का संघर्ष। इस उथल-पुथल के बीच साम्राज्य की रक्षा का भार उस व्यक्ति पर आ गिरता है जिसे सिंहासन का मोह नहीं है।

छायावाद युग में जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित यह आधुनिक हिंदी साहित्य का एक प्रमुख ऐतिहासिक नाटक है। इसमें पांचवीं शताब्दी के गुप्त काल के घटनाक्रम को आधार बनाकर तत्कालीन भारत की राष्ट्रीयता और राजनीतिक संघर्ष को मंच पर आकार दिया गया है।

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LanguageHindi
Source
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