
यह पुस्तक अठारहवीं शताब्दी की महान शासिका और समाज सुधारक अहिल्याबाई होलकर के जीवन और कार्यों पर आधारित एक महत्वपूर्ण जीवनी है। गोविन्दराम केशवराम जोशी ने इस कृति में अहिल्याबाई के साधारण परिवार में जन्म से लेकर मालवा की महारानी बनने तक की यात्रा का विस्तृत वर्णन किया है। लेखक ने उनके पति खांडेराव की असामयिक मृत्यु के बाद उनके द्वारा दिखाए गए असाधारण साहस और राज्य संचालन में उनकी कुशलता को रेखांकित किया है। पुस्तक में यह भी बताया गया है कि कैसे उन्होंने अपने ससुर मल्हारराव होलकर से प्रशासन की बारीकियां सीखीं और 1767 में इंदौर की गद्दी संभालने के बाद अपनी प्रजा के लिए एक आदर्श शासन स्थापित किया।
अहिल्याबाई के शासनकाल में न्याय, धर्म और प्रजा कल्याण के उच्च आदर्शों को जोशी ने इस पुस्तक में बखूबी प्रस्तुत किया है। उनके द्वारा काशी, गया, सोमनाथ, द्वारका, रामेश्वर, जगन्नाथपुरी और अयोध्या जैसे पवित्र स्थलों पर मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार, धर्मशालाओं की स्थापना, और मार्गों का निर्माण उनकी दूरदर्शिता को दर्शाता है। यह पुस्तक एक ऐसी महिला शासक की कहानी है जिसने पुरुष प्रधान समाज में अपनी योग्यता से न केवल अपना स्थान बनाया बल्कि भारतीय इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी। यह कृति मराठी साहित्य में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में मानी जाती है और यह पाठकों को अहिल्याबाई के चरित्र की गहराई, उनके नैतिक मूल्यों और कुशल प्रशासनिक क्षमताओं से परिचित कराती है।