
‘कामायनी: जयशंकर प्रसाद’ हिंदी साहित्य के छायावादी युग की सर्वोच्च उपलब्धि और एक कालजयी महाकाव्य है। इस कृति में प्रलय के पश्चात मनु, श्रद्धा और इड़ा के माध्यम से मानव चेतना के क्रमिक विकास और सभ्यता के पुनर्निर्माण की मनोवैज्ञानिक कथा को अत्यंत कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘चिंता’ से आरंभ होकर ‘आनंद’ तक की यात्रा तय करने वाले इसके सर्ग न केवल पौराणिक आख्यान कहते हैं, बल्कि इच्छा, ज्ञान और क्रिया के समन्वय (समरसता) का संदेश देते हुए शैव दर्शन की गहराइयों को भी स्पर्श करते हैं। यह रचना मानवीय भावनाओं के संघर्ष और अंततः आनंद की प्राप्ति का एक अद्वितीय दार्शनिक दस्तावेज है।