
रश्मिरथी रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित एक महाकाव्य है जो महाभारत के सबसे विवादास्पद और त्रासद पात्र कर्ण के जीवन पर केंद्रित है। यह काव्य कृति सात सर्गों में विभाजित है और कर्ण के जन्म से लेकर उनकी मृत्यु तक की कहानी को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है। दिनकर ने कर्ण को केवल एक दुर्योधन के मित्र या पांडवों के शत्रु के रूप में नहीं, बल्कि एक महान योद्धा, दानवीर और सामाजिक भेदभाव के शिकार व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है। काव्य में कर्ण की पीड़ा, उनके संघर्ष, उनकी वीरता और उनके अद्भुत दान की भावना को बड़ी संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है।
इस रचना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सामाजिक समानता, जाति व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह और मानवीय गरिमा के प्रश्नों को उठाती है। कर्ण का चरित्र दिनकर के हाथों एक विद्रोही नायक का रूप ले लेता है जो समाज की कुरीतियों और अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है। 1952 में प्रकाशित यह कृति आधुनिक हिंदी साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं में गिनी जाती है और इसने पाठकों को पारंपरिक कथाओं को नए सिरे से समझने का अवसर दिया।
रश्मिरथी का साहित्यिक और सामाजिक महत्व अत्यधिक है। दिनकर की ओजस्वी भाषा शैली, प्रभावशाली छंद विधान और गहन मानवीय संवेदना इस काव्य को अमर बना देती है। यह कृति न केवल साहित्यिक उत्कृष्टता का प्रतीक है बल्कि स्वतंत्रता के बाद के भारत में सामाजिक न्याय और समानता की मांग को भी स्वर देती है। आज भी यह पुस्तक हिंदी साहित्य के छात्रों और प्रेमियों के लिए अनिवार्य पाठ मानी जाती है और कर्ण के चरित्र को समझने का सबसे प्रामाणिक आधुनिक स्रोत है।