
देशभक्ति, मातृत्व, बचपन और नारी-अस्मिता को अपनी कविताओं का केन्द्र बनाने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान हिन्दी की उन पहली स्त्री-स्वरों में हैं जिनकी पंक्ति "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी" आज भी हर भारतीय के कण्ठ में बसी है। स्वाधीनता-संग्राम में दो बार जेल जाने वाली कवयित्री की रचनाओं में राष्ट्रप्रेम का आह्वान और घर-आँगन की कोमल संवेदना साथ-साथ चलती है। इस संचयन में उनकी पचास कविताएँ संग्रहीत हैं — "मुकुल" और "बिखरे मोती" से लेकर "त्रिधारा" तक की। स्वाधीनता-पूर्व भारत की स्त्री-संवेदना का यह अनमोल दस्तावेज़ अब सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है।