रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियाँ

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियाँ

12h 35m
150,825 words
hi

नदी किनारे काँठलिया जा रही नौका पर अचानक आकर भोजन पकाने में जुट जाने वाला एक पंद्रह वर्षीय किशोर; कलकत्ता की गलियों में अपनी दूर बैठी बेटी की याद लिए फिरता एक अफगान व्यापारी; सुदूर गाँव के डाकघर में दिन काटता शहर का एक युवक; और पंद्रह साल के वैवाहिक जीवन के बाद अपना घर छोड़ने का फैसला लिखकर सुनाती एक स्त्री।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ये कहानियाँ उन्नीसवीं सदी के बंगाल की सामाजिक संरचना को सामने रखती हैं। इन कथाओं में जमींदारी प्रथा, दहेज और बंगाल पुनर्जागरण के दौर में बदलते मध्यवर्गीय परिवारों के भीतर का सीधा टकराव दर्ज है। यहाँ हवेलियों के बंद कमरों और गाँव-कस्बों की दिनचर्या के विवरण बिना किसी आवरण के मिलते हैं।

नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक द्वारा रची गई ये कथाएँ आधुनिक भारतीय साहित्य का आरंभिक ढाँचा तय करती हैं। यह संस्करण इन मूल बंगाली कहानियों का हिंदी अनुवाद है।

PublisherKafka
LanguageHindi