
रायसाहब कन्हैयालाल के घर हर शाम कीर्तन होता है। उनके परिचित और वेतनभोगी लोग केवल प्रसाद के लालच और पड़ोस की महिलाओं की उपस्थिति से उत्साहित होकर भजन गाते हैं, जब तक कि कृष्णाष्टमी पर एक पेशेवर मंडली बुलाने की मांग इस बैठकबाजी की दिनचर्या को नहीं बदल देती। 'भक्त की टेर' के साथ, इस संग्रह में तेईस अन्य कहानियाँ शामिल हैं: एक कम्यूनिस्ट सभा की कार्यवाही; चुनाव के दिनों में एक वोटर का महत्व; मूंछों से जुड़ा सामाजिक सम्मान; और रक्षा-बंधन के दिन भाई-बहन के पारिवारिक रिश्ते।
इन चौबीस कहानियों में बीसवीं सदी के भारतीय समाज की परंपराओं, घरेलू जीवन और राजनीतिक बदलावों का सीधा विवरण है। यहाँ परिवार के भीतर के तनाव और बाहर बदलते सामाजिक मूल्यों को बिना किसी आवरण के रखा गया है।
विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक' प्रेमचंद युग के कहानीकार थे। यह पुस्तक उसी दौर के यथार्थ और मध्यवर्गीय समाज को दर्ज करती है।