
इम्तिहान के दिन क़रीब हैं। पढ़ाई के लिए सुबह जल्दी उठने की खातिर एक छात्र अपने पड़ोसी लाला कृपा शंकर जी ब्रहम्चारी से गुज़ारिश करता है कि वे उसे भी जगा दिया करें। अगले दिन यह मामूली बात एक आफ़त बन जाती है। लाला जी दरवाज़े पर ऐसी मुक्का-बाज़ी शुरू करते हैं कि लकड़ी की दीवारें कांपने लगती हैं, सुराही पर रखा गिलास बजने लगता है, और नींद में डूबे छात्र को लगता है जैसे कोई मुर्दों को ज़िंदा करने के लिए तोपें दाग रहा हो।
बिस्तर से बाहर निकलने से पहले एक इंसान को अपने मन को किस कदर समझाना-बुझाना पड़ता है, यह उसी जद्दोजहद का ब्यौरा है। दरवाज़ा लगातार खटखटाया जा रहा है, चीख-चीख कर शुक्रिया अदा करने के बावजूद आवाज़ें अनसुनी रहती हैं, और तूफ़ान तब जाकर थमता है जब अंदर हार मानकर लैम्प जलाया जाता है।
पतरस बुख़ारी की यह रचना उर्दू साहित्य के क्लासिक व्यंग्य का हिस्सा है। इसमें रोज़मर्रा के जीवन की साधारण विडंबनाओं को दर्ज़ किया गया है।