
पतरस के मज़ामीन उर्दू साहित्य के हास्य और व्यंग्य में एक मील का पत्थर मानी जाती है। 1927 में पहली बार प्रकाशित, इस संक्षिप्त संग्रह में ग्यारह ऐसे निबंध शामिल हैं जिन्होंने अपनी वाकपटुता, सूक्ष्म अवलोकन और निश्छल हास्य से पाठकों की कई पीढ़ियों का मनोरंजन किया है। अहमद शाह बुख़ारी, जिन्होंने ‘पतरस’ उपनाम अपनाया, जीवन की साधारण घटनाओं में भी अद्भुत हास्य खोज लेते हैं। चाहे वह सुबह जल्दी उठने की कशमकश हो, एक पुरानी साइकिल की सवारी की मुसीबतें, या फिर हॉस्टल के जीवन और सिनेमा के किस्से—बुख़ारी मानवीय स्वभाव को एक बेहद हल्के-फुल्के मगर परिष्कृत अंदाज़ में पेश करते हैं। अपने दौर के तीखे व्यंग्यकारों के विपरीत, पतरस का मज़ाक सौम्य और अपना सा लगता है, जिसने उन्हें दक्षिण एशियाई साहित्य के सबसे चहेते लेखकों में से एक बना दिया है।