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बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स

बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स

भीमराव अंबेडकर

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10,282 words
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‘बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स’ डॉ. भीमराव अंबेडकर का 1956 में लिखा गया अंतिम निबंध है — उसी वर्ष उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और कुछ ही महीनों बाद उनका देहांत हो गया। निबंध सात खंडों में बुद्ध की शिक्षाओं और मार्क्सवादी सिद्धांत को आमने-सामने रखता है : संपत्ति, वर्ग-संघर्ष, शोषण, राज्य की भूमिका और अंततः साम्यवाद के लक्ष्य तक पहुँचने के साधनों की तुलना। अंबेडकर मार्क्स के अंतिम उद्देश्यों से सहमत दिखते हैं, पर वे तर्क देते हैं कि हिंसा, तानाशाही और बल-प्रयोग से स्थापित साम्यवाद क्षणिक है; बुद्ध का मन-परिवर्तन तथा पंचशील-आधारित मार्ग अधिक टिकाऊ है। यह हिन्दी अनुवाद हिंदी समय (महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा) से लिया गया है; अनुवादक का नाम स्रोत पर अंकित नहीं है।

हिंदी साहित्यविमर्शअंबेडकर विमर्शबौद्ध धर्ममार्क्सवादसाम्यवादतुलनात्मक दर्शनराजनीतिक दर्शनसामाजिक न्यायअहिंसाबीसवीं सदीअनुवादक्लासिक साहित्य
LanguageHindi
Source
हिंदी समय (महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा)

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