
4 अगस्त 1908 को 'उर्दू-ए-मुअल्ला' के संपादक को राजद्रोह के आरोप में दो साल की बामशक्कत कैद और 500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई जाती है। ब्रिटिश मजिस्ट्रेट का उद्देश्य केवल एक राजनीतिक बंदी को जेल भेजना नहीं, बल्कि एक फकीराना जीवन जीने वाले इस शख्स के छापेखाने और कुतुबखाने को पूरी तरह बर्बाद करना है। अलीगढ़ जेल से इलाहाबाद सेंट्रल जेल की बैरक नंबर 7 तक का सफर इसी सजा का दस्तावेज़ है।
डायरी में सलाखों के पीछे की दैनिक और राजनीतिक वास्तविकताएं दर्ज हैं। इसमें चक्की पीसने की कठोर मशक्कत और गोरे-काले कैदियों के बीच होने वाले भेदभाव का सीधा विवरण है। इसके पन्नों में जेल की ईद, स्वामी शिवानंद व बंदा अहीर जैसे साथी कैदियों का मनोविज्ञान, और इन सबके बीच शायरी की मश्क़ को जारी रखने की जद्दोजहद शामिल है।
यह पुस्तक बीसवीं सदी की शुरुआत में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राजनीतिक बंदियों की स्थिति और ब्रिटिश न्याय प्रणाली की कार्यप्रणाली का एक प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोत है।