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धर्मपरायण रीछ

धर्मपरायण रीछ

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी

10 min
1,891 words
hi
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समालोचक (1906) में प्रकाशित यह कथा गुलेरी के संस्कृत-संस्कारों में रची आख्यायिका है। तूफ़ानी रात में एक व्याध रीछ के कोटर में शरण पाता है; नीचे घात लगाए सिंह उकसाता है कि आततायी का काम तमाम कर लेने दो, पर रीछ अतिथि-धर्म से डिगता नहीं — यह मेरी शरण में आया है, इसके पीछे चाहे मेरे प्राण जाएँ। व्याध का विश्वासघात भी उस वीतराग को क्रोध नहीं दिला पाता; कवच-कुण्डल देने वाले कर्ण की उदारता भी उसके आगे फीकी पड़ती है। भक्ति और क्षमा की इस कथा का अन्त बैकुण्ठ में होता है — भगवान, व्याध और ऋक्ष एक ही विमान में।

कहानी संग्रहहिंदी साहित्यधर्म कथानीति कथापशु कथाक्षमाभक्तिस्वतंत्रता-पूर्व साहित्यक्लासिक साहित्य
LanguageHindi
Source
उसने कहा था और अन्य कहानियाँ (राजपाल एण्ड सन्ज़, 2014)

Books by चन्द्रधर शर्मा गुलेरी

कहानियाँकहानियाँ
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