
समालोचक (1906) में प्रकाशित यह कथा गुलेरी के संस्कृत-संस्कारों में रची आख्यायिका है। तूफ़ानी रात में एक व्याध रीछ के कोटर में शरण पाता है; नीचे घात लगाए सिंह उकसाता है कि आततायी का काम तमाम कर लेने दो, पर रीछ अतिथि-धर्म से डिगता नहीं — यह मेरी शरण में आया है, इसके पीछे चाहे मेरे प्राण जाएँ। व्याध का विश्वासघात भी उस वीतराग को क्रोध नहीं दिला पाता; कवच-कुण्डल देने वाले कर्ण की उदारता भी उसके आगे फीकी पड़ती है। भक्ति और क्षमा की इस कथा का अन्त बैकुण्ठ में होता है — भगवान, व्याध और ऋक्ष एक ही विमान में।