
भारत मित्र (1911) में छपी यह कहानी हिन्दी के आरम्भिक हास्य की सबसे चमकदार मिसालों में है। परीक्षा देकर लौटता कथावाचक राह में आम के बगीचे का लोभ नहीं छोड़ पाता और वहीं एक बूढ़े सज्जन की नज़र में ‘सुयोग्य वर’ बन बैठता है। ‘सुखमय जीवन’ नामक पोथी, कमला की माँ की सच्चाई और एक अप्रत्याशित सगाई — तीन खण्डों में बँटी यह कथा गुलेरी की उस दुर्लभ प्रतिभा की गवाह है जो व्यंग्य को आत्म-परिहास में घोलकर परोसती है।