
गुलाबदेई ने आँगन गोबर से लीपकर चावल के मण्डन माँड़े हैं, बुढ़िया माता की पथराई आँखें दरवाज़े पर लगी हैं, और सात वर्ष का हीरा पड़ोसियों से कहता फिर रहा है कि मेरा चाचा आवेगा। तीन वर्ष के वियोग, कंगाली और बीमारी के बाद लहनासिंह लौटा है — चेहरे पर घावों के खड्डे, छाती पर चाँदी के तमगे और एक टाँग की जगह चमड़े के तसमों से बँधा डंडा। जिस देश की स्त्रियाँ पत्र लिखना नहीं जानतीं, वहाँ प्रेम आँसुओं की धारा में बहता है — इसी अनकहे प्रेम का चित्र गुलेरी ने इस छोटी-सी कथा में खींचा है।