
चारुलता रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक मार्मिक मध्यम-लंबाई की कहानी है जो 1900 में प्रकाशित हुई थी। यह कथा उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के कलकत्ता में स्थापित है और एक संपन्न बंगाली परिवार की घरेलू जीवन को चित्रित करती है। कहानी की केंद्रीय पात्र चारुलता, एक सुशिक्षित और संवेदनशील महिला है जो अपने पति भूपति की उपेक्षा का शिकार है। भूपति एक समाचार पत्र के संपादक हैं जो अपने काम में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे अपनी पत्नी की भावनात्मक आवश्यकताओं को नजरअंदाज कर देते हैं। चारु की एकाकी जीवन में एक नया मोड़ आता है जब भूपति के चचेरे भाई अमल उनके घर आते हैं। अमल एक युवा, साहित्यिक रुचियों वाला व्यक्ति है जो चारु की रचनात्मक प्रतिभा को प्रोत्साहित करता है।
टैगोर इस कृति में स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलताओं, भावनात्मक अलगाव, और उन्नीसवीं सदी के भद्रलोक समाज में शिक्षित महिलाओं की स्थिति को सूक्ष्मता से प्रस्तुत करते हैं। कहानी चारु और अमल के बीच विकसित होती भावनात्मक निकटता और उससे उत्पन्न नैतिक द्वंद्व को संवेदनशीलता के साथ दर्शाती है। यह कृति बंगाली साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि यह उस युग की सामाजिक वास्तविकता और महिलाओं की आंतरिक दुनिया को प्रामाणिकता से चित्रित करती है। सत्यजीत रे ने 1964 में इसी कहानी पर आधारित अपनी प्रसिद्ध फिल्म बनाई जो विश्व सिनेमा की उत्कृष्ट कृतियों में गिनी जाती है। यह रचना टैगोर की मनोवैज्ञानिक गहराई और सूक्ष्म पर्यवेक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण है।