
आरज़ू लखनवी की शायरी
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लखनऊ के मुशायरों और गलियों से उभरी इन ग़ज़लों और नज़्मों में इंसानी जज़्बात का सीधा हिसाब है। यहाँ एक तरफ़ "किसने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी" जैसी पंक्तियाँ एक दृश्य उकेरती हैं, तो दूसरी तरफ़ वो शिकायतें हैं जहाँ दिन को रात मान लिया गया है और सूने घर में नींद नहीं आती।
कवि उन चेहरों की बात करता है जो मुँह दिखाकर छिप जाते हैं, और उस खेती का ज़िक्र करता है जो बोए जाने के बाद जल गई। इन पन्नों में 'सुख में भी देखें हैं दुःख' की हक़ीक़त है और उस वादे की उलझन है जिसके सच्चे या झूठे होने का इल्म नहीं। इसमें तरसी हुई आँखों की झलक और सनकी हवाओं का ज़िक्र है।
आरज़ू लखनवी की ये गज़लें क्लासिकल उर्दू साहित्य, रीख़्ता और लखनऊ घराने की उस परंपरा में आती हैं, जिनका संबंध मुग़लकालीन साहित्य और 18वीं सदी के हिंदुस्तानी अदब से है।
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PublisherKafka
LanguageHindi
Source
Arsh Sultanpuri























