
सियाह हाशिए
‘सियाह हाशिए’ सआदत हसन मंटो का वो शाहकार है जो 1947 के भारत-पाक विभाजन की विभीषिका को एक बिल्कुल नए और खौफ़नाक नज़रिए से पेश करता है। ये महज़ लघु-कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि उस दौर की इंसानियत के गिरते स्तर और हैवानियत का एक ऐसा दस्तावेज है जिसे मंटो ने बेहद संक्षिप्त, तीखी और व्यंग्यात्मक लघुकथाओं के ज़रीए उकेरा है। मंटो ने इसमें किसी एक धर्म या क़ौम की तरफ़दारी नहीं की, बल्कि उस पागलपन को निशाना बनाया है जिसने पड़ोसी को पड़ोसी का दुश्मन बना दिया था। मंटो की क़लम की अस्ली ताक़त उसकी निर्भीकता और निष्पक्षता में है। ‘सियाह हाशिए’ में मंटो ने हिंसा को ग्लैमराइज़ नहीं किया, बल्कि उसे इतनी रूखी और सपाट भाषा में लिखा है कि पढ़ने वाले को उस सन्नाटे में भी चीख़ें सुनाई देती हैं। ये लघुकथाएँ दिखाती हैं कि कैसे नफ़रत की आंधी में नैतिकता, रिश्ते और जज़्बात तिनकों की तरह बिखर जाते हैं। आज भी ये किताब उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि इसकी लघुकथाएँ हमें याद दिलाती है कि सरहदें खिंच जाने से इंसानियत का बटवारा नहीं होना चाहिए, मगर जब होता है, तो उसके 'हाशिए' हमेशा काले (सियाह) होते हैं।














































