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कुल्लियात-ए-मीर

कुल्लियात-ए-मीर

मीर तक़ी मीर

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18वीं सदी की मुग़लकालीन दिल्ली में, जब साम्राज्य का राजनीतिक ढाँचा दरक रहा था, रेख़्ता परंपरा ने एक नई काव्य भाषा का रूप लिया। इस संपूर्ण संकलन में छह दीवानों की ग़ज़लें, मसनवियाँ और अन्य काव्य रचनाएँ शामिल हैं। फ़ारसी काव्य-शैलियों और सूफ़ियाना विचारों के बीच लिखी गई ये कविताएँ सीधे तौर पर इश्क़, विरह और उस दौर के सांसारिक मोहभंग का हिसाब रखती हैं।

इसके तीसरे, पाँचवें और छठे खंड में मौजूद शायरी दरबारों की औपचारिकता से अलग, आम बोलचाल की शब्दावली में रची गई है। यहाँ हर शेर और ग़ज़ल शास्त्रीय उर्दू काव्य के कठोर अनुशासन, रदीफ़ और क़ाफ़िए के नियमों में बँधी है।

यह दिल्ली स्कूल की उर्दू शायरी का बुनियादी दस्तावेज़ है, जिसने मीर तक़ी मीर को इस भाषा के ऐतिहासिक और केंद्रीय रचनाकारों की सूची में स्थायी रूप से दर्ज किया।

उर्दू शायरीक्लासिकल उर्दू साहित्यग़ज़ल18वीं सदीमुग़ल कालरोमांटिक शायरीदिल्ली स्कूलइश्क़िया शायरीफ़ारसी प्रभावसूफ़ियाना तत्वदर्द और विरहशास्त्रीय काव्यदीवानरेख़्ता परंपरा
PublisherAdbi Duniya
LanguageHindi, Urdu
Source
Adbi Duniya

Audiobooks by मीर तक़ी मीर

ज़िक्र-ए-मीरज़िक्र-ए-मीर

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