
वली दकनी (1667–1707) को उर्दू ग़ज़ल का बानी और बाबा-ए-रेख़्ता कहा जाता है। औरंगाबाद (दक्कन) के इस शायर ने उर्दू शायरी को वो बुनियाद दी जिस पर आगे चलकर मीर, ग़ालिब और दूसरे शायरों ने इमारत खड़ी की। उनकी ग़ज़लों में हिन्दवी और फ़ारसी का ख़ूबसूरत मिश्रण है, इश्क़ की सादगी और दक्कनी ज़बान का अनोखा रंग है।